Sunday, January 8, 2012

मैं मुहब्बत हूँ ज़बानों में न बाँटों मुझ को

"इतनी नफ़रत भरे लहजे में न बोलो मुझसे ,
एक एहसास हूँ, एहसास से काटो मुझ को ,
सिर्फ लिखने के है औज़ार ये हिंदी उर्दू ,
मैं मुहब्बत हूँ ज़बानों में न बाँटों मुझ को....."

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पास रुकता भी नहीं,दिल से गुज़रता भी नहीं ,
वैसे लम्हा कोई जाया नहीं लगता मुझ को 
गाँव छोड़ा था कभी और अब यादें छूटीं ,
अब कोई शहर पराया नहीं लगता मुझ को ....

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दर्द का साज़ दे रहा हूँ तुम्हे.
दिल के सब राज़ दे रहा हूँ तुम्हे.
ये ग़ज़ल, गीत सब बहाने है.
मैं तो आवाज़ दे रहा हूँ तुमहे.......

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